Navagraha · Traditional devotional text · Source: vignanam.org (Traditional devotional text (public-domain shlokas))
दोहा जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल करण कृपाल । दीनन के दुख दूर करि, कीजै नाथ निहाल ॥
जय जय श्री शनिदेव प्रभु, सुनहु विनय महाराज । करहु कृपा हे रवि तनय, राखहु जन की लाज ॥
चौपाई जयति जयति शनिदेव दयाला । करत सदा भक्तन प्रतिपाला ॥
चारि भुजा, तनु श्याम विराजै । माथे रतन मुकुट छवि छाजै ॥
परम विशाल मनोहर भाला । टेढई दृष्टि भृकुटि विकराला ॥
कुंडल श्रवण चमाचम चमके । हिये माल मुक्तन मणि दमके ॥
कर में गदा त्रिशूल कुठारा । पल बिच करैं आरिहिं संहारा ॥
पिंगल, कृष्णों, छाया, नंदन । यम, कोणस्थ, रौद्र, दुख भंजन॥
सौरी, मंद, शनि, दश नामा । भानु पुत्र पूजहिं सब कामा ॥
जा पर प्रभु प्रसन्न है जाहीम् । रंकहुं राव करैंक्षण माहीम् ॥
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पर्वतहू तृण होई निहारत । तृण हू को पर्वत करि डारत॥
राज मिलत बन रामहिं दीन्हो । कैकेइहुं की मति हरि लीन्हों॥
बनहूं में मृग कपट दिखाई । मातु जानकी गी चतुराई॥
लखनहिं शक्ति विकल करि डारा । मचिगा दल में हाहाकारा॥
रावण की गति-मति बौराई । रामचंद्र सों बैर बढई॥
दियो कीट करि कंचन लंका । बजि बजरंग बीर की डंका॥
नृप विक्रम पर तुहि पगु धारा । चित्र मयूर निगलि गै हारा॥
हार नौलाखा लाग्यो चोरी । हाथ पैर डरवायो तोरी॥
भारी दशा निकृष्ट दिखायो । तेलिहिं घर कोल्हू चलवायो॥
विनय राग दीपक महं कीन्होम् । तब प्रसन्न प्रभु है सुख दीन्हों॥
हरिश्चंद्र नृप नारि बिकानी । आपहुं भरे डोम घर पानी॥
तैसे नल परदशा सिरानी । भूंजी-मीन कूद गी पानी॥
श्री शंकरहि गहयो जब जाई । पार्वती को सती कराई॥
तनिक विलोकत ही करि रीसा । नभ उडि़ गयो गौरिसुत सीसा॥
पांडव पर भै दशा तुम्हारी । बची द्रौपदी होति उघारी॥
कौरव के भी गति मति मारयो । युद्घ महाभारत करि डारयो॥
रवि कहं मुख महं धरि तत्काला । लेकर कूदि परयो पाताला ॥
शेष देव-लखि विनती लाई । रवि को मुख ते दियो छुडई ॥
वाहन प्रभु के सात सुजाना । जग दिग्ज गर्दभ मृग स्वाना ॥
जंबुक सिंह आदि नखधारी । सो फल जज्योतिष कहत पुकारी ॥
गज वाहन लक्ष्मी गृह आवैम् । हय ते सुख संपत्ति उपजावैम् ॥
गर्दभ हानि करै बहु काजा । गर्दभ सिद्घ कर राज समाजा ॥
जंबुक बुद्घि नष्ट कर डारै । मृग दे कष्ट प्रण संहारै ॥
जब आवहिं प्रभु स्वान सवारी । चोरी आदि होय डर भारी ॥
तैसहि चारि चरण यह नामा । स्वर्ण लौह चांजी अरु तामा ॥
लौह चरण पर जब प्रभु आवैम् । धन जन संपत्ति नष्ट करावै ॥
समता ताम्र रजत शुभकारी । स्वर्ण सर्व सुख मंगल कारी ॥
जो यह शनि चरित्र नित गावै । कबहुं न दशा निकृष्ट सतावै ॥
अदभुत नाथ दिखावैं लीला । करैं शत्रु के नशि बलि ढीला ॥
जो पंडित सुयोग्य बुलवाई । विधिवत शनि ग्रह शांति कराई ॥
पीपल जल शनि दिवस चढावत । दीप दान दै बहु सुख पावत ॥
कहत रामसुंदर प्रभु दासा । शनि सुमिरत सुख होत प्रकाशा ॥
दोहा पाठ शनिश्चर देव को, की हों विमल तैयार । करत पाठ चालीस दिन, हो भवसागर पार ॥
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