Subrahmanya Swamy · Traditional devotional text · Source: vignanam.org (Traditional devotional text (public-domain shlokas))
गिरितनयासुत गांगपयोदित गंधसुवासित बालतनो गुणगणभूषण कोमलभाषण क्रौंचविदारण कुंदतनो । गजमुखसोदर दुर्जयदानवसंघविनाशक दिव्यतनो जय जय हे गुह षण्मुख सुंदर देहि रतिं तव पादयुगे ॥ 1 ॥
प्रतिगिरिसंस्थित भक्तहृदिस्थित पुत्रधनप्रद रम्यतनो भवभयमोचक भाग्यविधायक भूसुतवार सुपूज्यतनो । बहुभुजशोभित बंधविमोचक बोधफलप्रद बोधतनो जय जय हे गुह षण्मुख सुंदर देहि रतिं तव पादयुगे ॥ 2 ॥
शमधनमानित मौनिहृदालय मोक्षकृदालय मुग्धतनो शतमखपालक शंकरतोषक शंखसुवादक शक्तितनो । दशशतमन्मथ सन्निभसुंदर कुंडलमंडित कर्णविभो जय जय हे गुह षण्मुख सुंदर देहि रतिं तव पादयुगे ॥ 3 ॥
गुह तरुणारुणचेलपरिष्कृत तारकमारक मारतनो जलनिधितीरसुशोभिवरालय शंकरसन्नुत देवगुरो । विहितमहाध्वरसामनिमंत्रित सौम्यहृदंतर सोमतनो जय जय हे गुह षण्मुख सुंदर देहि रतिं तव पादयुगे ॥ 4 ॥
लवलिकया सह केलिकलापर देवसुतार्पित माल्यतनो गुरुपदसंस्थित शंकरदर्शित तत्त्वमयप्रणवार्थविभो । विधिहरिपूजित ब्रह्मसुतार्पित भाग्यसुपूरक योगितनो जय जय हे गुह षण्मुख सुंदर देहि रतिं तव पादयुगे ॥ 5 ॥
कलिजनपालन कंजसुलोचन कुक्कुटकेतन केलितनो कृतबलिपालन बर्हिणवाहन फालविलोचनशंभुतनो । शरवणसंभव शत्रुनिबर्हण चंद्रसमानन शर्मतनो जय जय हे गुह षण्मुख सुंदर देहि रतिं तव पादयुगे ॥ 6 ॥
सुखदमनंतपदान्वित रामसुदीक्षित सत्कविपद्यमिदं शरवण संभव तोषदमिष्टदमष्टसुसिद्धिदमार्तिहरम् । पठति शृणोति च भक्तियुतो यदि भाग्यसमृद्धिमथो लभते जय जय हे गुह षण्मुख सुंदर देहि रतिं तव पादयुगे ॥ 7 ॥
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इति श्रीअनंतरामदीक्षित कृतं षण्मुख षट्कम् ॥
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