Hanuma · Traditional devotional text · Source: vignanam.org (Traditional devotional text (public-domain shlokas))
दोहा श्री गुरु चरण सरोज रज निजमन मुकुर सुधारि । वरणौ रघुवर विमलयश जो दायक फलचारि ॥ बुद्धिहीन तनुजानिकै सुमिरौ पवन कुमार । बल बुद्धि विद्या देहु मोहि हरहु कलेश विकार ॥
ध्यानम् अतुलित बलधामं स्वर्ण शैलाभ देहम् । दनुज वन कृशानुं ज्ञानिना मग्रगण्यम् ॥ सकल गुण निधानं वानराणा मधीशम् । रघुपति प्रिय भक्तं वातजातं नमामि ॥
गोष्पदीकृत वाराशिं मशकीकृत राक्षसम् । रामायण महामाला रत्नं वंदे-(अ)निलात्मजम् ॥ यत्र यत्र रघुनाथ कीर्तनं तत्र तत्र कृतमस्तकांजलिम् । भाष्पवारि परिपूर्ण लोचनं मारुतिं नमत राक्षसांतकम् ॥
मनोजवं मारुत तुल्यवेगम् । जितेंद्रियं बुद्धि मतां वरिष्टम् ॥ वातात्मजं वानरयूथ मुख्यम् । श्री राम दूतं शिरसा नमामि ॥
चौपाई जय हनुमान ज्ञान गुण सागर । जय कपीश तिहु लोक उजागर ॥ 1 ॥
रामदूत अतुलित बलधामा । अंजनि पुत्र पवनसुत नामा ॥ 2 ॥
महावीर विक्रम बजरंगी । कुमति निवार सुमति के संगी ॥3 ॥
कंचन वरण विराज सुवेशा । कानन कुंडल कुंचित केशा ॥ 4 ॥
हाथवज्र औ ध्वजा विराजै । [औरु] कांथे मूंज जनेवू साजै ॥ 5॥
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शंकर सुवन केसरी नंदन । [शंकर स्वयं] तेज प्रताप महाजग वंदन ॥ 6 ॥
विद्यावान गुणी अति चातुर । राम काज करिवे को आतुर ॥ 7 ॥
प्रभु चरित्र सुनिवे को रसिया । रामलखन सीता मन बसिया ॥ 8॥
सूक्ष्म रूपधरि सियहि दिखावा । विकट रूपधरि लंक जलावा ॥ 9 ॥
भीम रूपधरि असुर संहारे । रामचंद्र के काज संवारे ॥ 10 ॥
लाय संजीवन लखन जियाये । श्री रघुवीर हरषि उरलाये ॥ 11 ॥
रघुपति कीन्ही बहुत बडायी (ई) । तुम मम प्रिय भरत सम भायी ॥ 12 ॥
सहस्र वदन तुम्हरो यशगावै । अस कहि श्रीपति कंठ लगावै ॥ 13 ॥
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीशा । नारद शारद सहित अहीशा ॥ 14 ॥
यम कुबेर दिगपाल जहां ते । कवि कोविद कहि सके कहां ते ॥ 15 ॥
तुम उपकार सुग्रीवहि कीन्हा । राम मिलाय राजपद दीन्हा ॥ 16 ॥
तुम्हरो मंत्र विभीषण माना । लंकेश्वर भये सब जग जाना ॥ 17 ॥
युग सहस्र योजन पर भानू । लील्यो ताहि मधुर फल जानू ॥ 18 ॥
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माही । जलधि लांघि गये अचरज नाही ॥ 19 ॥
दुर्गम काज जगत के जेते । सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते ॥ 20 ॥
राम दुआरे तुम रखवारे । होत न आज्ञा बिनु पैसारे ॥ 21 ॥
सब सुख लहै तुम्हारी शरणा । तुम रक्षक काहू को डर ना ॥ 22 ॥
आपन तेज सम्हारो आपै । तीनों लोक हांक ते कांपै ॥ 23 ॥
भूत पिशाच निकट नहि आवै । महवीर जब नाम सुनावै ॥ 24 ॥
नासै रोग हरै सब पीरा । जपत निरंतर हनुमत वीरा ॥ 25 ॥
संकट से हनुमान छुडावै । मन क्रम वचन ध्यान जो लावै ॥ 26 ॥
सब पर राम तपस्वी राजा । तिनके काज सकल तुम साजा ॥ 27 ॥
और मनोरथ जो कोयि लावै । तासु अमित जीवन फल पावै ॥ 28 ॥
चारो युग प्रताप तुम्हारा । है परसिद्ध जगत उजियारा ॥ 29 ॥
साधु संत के तुम रखवारे । असुर निकंदन राम दुलारे ॥ 30 ॥
अष्ठसिद्धि नव निधि के दाता । अस वर दीन्ह जानकी माता ॥ 31 ॥
राम रसायन तुम्हारे पासा । सदा रहो रघुपति के दासा ॥ 32 ॥ [साद रहो]
तुम्हरे भजन रामको पावै । जन्म जन्म के दुख बिसरावै ॥ 33 ॥
अंत काल रघुपति पुरजायी । [रघुवर] जहां जन्म हरिभक्त कहायी ॥ 34 ॥
और देवता चित्त न धरयी । हनुमत सेयि सर्व सुख करयी ॥ 35 ॥
संकट क(ह)टै मिटै सब पीरा । जो सुमिरै हनुमत बल वीरा ॥ 36 ॥
जै जै जै हनुमान गोसायी । कृपा करहु गुरुदेव की नायी ॥ 37 ॥
यह शत वार पाठ कर कोयी । [जो] छूटहि बंदि महा सुख होयी ॥ 38 ॥
जो यह पडै हनुमान चालीसा । होय सिद्धि साखी गौरीशा ॥ 39 ॥
तुलसीदास सदा हरि चेरा । कीजै नाथ हृदय मह डेरा ॥ 40 ॥
दोहा पवन तनय संकट हरण - मंगल मूरति रूप् । राम लखन सीता सहित - हृदय बसहु सुरभूप् ॥ सियावर रामचंद्रकी जय । पवनसुत हनुमानकी जय । बोलो भायी सब संतनकी जय ।
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