Shiva · Traditional devotional text · Source: vignanam.org (Traditional devotional text (public-domain shlokas))
॥ शिव चालीसा ॥ ॐ नमः शिवाय
दोहा जय गणेश गिरिजासुवन मंगल मूल सुजान । कहत अयोध्यादास तुम दे-उ अभय वरदान ॥
जय गिरिजापति दीनदयाला । सदा करत संतन प्रतिपाला ॥ भाल चंद्रमा सोहत नीके । कानन कुंडल नाग फनी के ॥
अंग गौर शिर गंग बहाये । मुंडमाल तन क्षार लगाये ॥ वस्त्र खाल बाघंबर सोहे । छवि को देखि नाग मन मोहे ॥
मैना मातु कि हवे दुलारी । वाम अंग सोहत छवि न्यारी ॥ कर त्रिशूल सोहत छवि भारी । करत सदा शत्रुन क्षयकारी ॥
नंदी गणेश सोहैं तहं कैसे । सागर मध्य कमल हैं जैसे ॥ कार्तिक श्याम और गणरा-ऊ । या छवि कौ कहि जात न का-ऊ ॥
देवन जबहीं जाय पुकारा । तबहिं दुख प्रभु आप निवारा ॥ किया उपद्रव तारक भारी । देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी ॥
तुरत षडानन आप पठायौ । लव निमेष महं मारि गिरायौ ॥ आप जलंधर असुर संहारा । सुयश तुम्हार विदित संसारा ॥
त्रिपुरासुर सन युद्ध मचायी । तबहिं कृपा कर लीन बचायी ॥ किया तपहिं भागीरथ भारी । पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी ॥
Offered for worship and study, not as prediction. Non-commercial.
दानिन महं तुम सम को-उ नाहीम् । सेवक स्तुति करत सदाहीम् ॥ वेद माहि महिमा तुम गायी । अकथ अनादि भेद नहीं पायी ॥
प्रकटे उदधि मंथन में ज्वाला । जरत सुरासुर भे विहाला ॥ कीन्ह दया तहं करी सहायी । नीलकंठ तब नाम कहायी ॥
पूजन रामचंद्र जब कीन्हाम् । जीत के लंक विभीषण दीन्हा ॥ सहस कमल में हो रहे धारी । कीन्ह परीक्षा तबहिं त्रिपुरारी ॥
एक कमल प्रभु राखे-उ जोयी । कमल नयन पूजन चहं सोयी ॥ कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर । भये प्रसन्न दिए इच्छित वर ॥
जय जय जय अनंत अविनाशी । करत कृपा सबके घट वासी ॥ दुष्ट सकल नित मोहि सतावैम् । भ्रमत रहौं मोहे चैन न आवैम् ॥
त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो । यह अवसर मोहि आन उबारो ॥ ले त्रिशूल शत्रुन को मारो । संकट से मोहिं आन उबारो ॥
मात पिता भ्राता सब कोयी । संकट में पूछत नहिं कोयी ॥ स्वामी एक है आस तुम्हारी । आय हरहु मम संकट भारी ॥
धन निर्धन को देत सदा ही । जो कोयी जांचे सो फल पाहीम् ॥ अस्तुति केहि विधि करों तुम्हारी । क्षमहु नाथ अब चूक हमारी ॥
शंकर हो संकट के नाशन । मंगल कारण विघ्न विनाशन ॥ योगी यति मुनि ध्यान लगावैम् । शारद नारद शीश नवावैम् ॥
नमो नमो जय नमः शिवाय । सुर ब्रह्मादिक पार न पाय ॥ जो यह पाठ करे मन लायी । ता पर होत हैं शंभु सहायी ॥
रनियां जो कोयी हो अधिकारी । पाठ करे सो पावन हारी ॥ पुत्र होन की इच्छा जोयी । निश्चय शिव प्रसाद तेहि होयी ॥
पंडित त्रयोदशी को लावे । ध्यान पूर्वक होम करावे ॥ त्रयोदशी व्रत करै हमेशा । तन नहिं ताके रहै कलेशा ॥
धूप दीप नैवेद्य चढावे । शंकर सम्मुख पाठ सुनावे ॥ जन्म जन्म के पाप नसावे । अंत धाम शिवपुर में पावे ॥
कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी । जानि सकल दुख हरहु हमारी ॥
दोहा नित नेम उठि प्रातःही पाठ करो चालीस । तुम मेरी मनकामना पूर्ण करो जगदीश ॥
अथ त्रिगुण आरती शिवजी की
जय शिव ॐकारा हर जय शिव ॐकारा ब्रह्मा विष्णु सदाशिव अर्धांगी धारा ॥ टेक॥
एकानन चतुरानन पंचानन राजे हंसानन गरुडासन वृषवाहन साजे ॥ जय॥
दो भुज चार चतुर्भुज दस भुज अति सोहे तीनों रूप निरखता त्रिभुवन जन मोहे ॥ जय॥
अक्षमाला बनमाला रुंडमाला धारी चंदन मृगमद सोहै भाले शशिधारी ॥ जय॥
श्वेतांबर पीतांबर बाघंबर अंगे सनकादिक गरुडादिक भूतादिक संगे ॥ जय॥
कर मध्ये सुकमंडल चक्र त्रिशूल धर्ता जगकर्ता जगभर्ता जगसंहारकर्ता ॥ जय॥
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका प्रणवाक्षर ॐ मध्ये ये तीनों एका ॥ जय॥
काशी में विश्वनाथ विराजत नंदो ब्रह्मचारी नित उठि भोग लगावत महिमा अति भारी ॥ जय॥
त्रिगुण स्वामी की आरती जो कोयी नर गावे कहत शिवानंद स्वामी मनवांछित फल पावे ॥ जय॥
Browse Related Categories: