Devi · Traditional devotional text · Source: vignanam.org (Traditional devotional text (public-domain shlokas))
नमो नमो दुर्गे सुख करनी । नमो नमो अंबे दुःख हरनी ॥ 1 ॥
निरंकार है ज्योति तुम्हारी । तिहू लोक फैली उजियारी ॥ 2 ॥
शशि ललाट मुख महाविशाला । नेत्र लाल भृकुटि विकराला ॥ 3 ॥
रूप मातु को अधिक सुहावे । दरश करत जन अति सुख पावे ॥ 4 ॥
तुम संसार शक्ति लय कीना । पालन हेतु अन्न धन दीना ॥ 5 ॥
अन्नपूर्णा हुयि जग पाला । तुम ही आदि सुंदरी बाला ॥ 6 ॥
प्रलयकाल सब नाशन हारी । तुम गौरी शिव शंकर प्यारी ॥ 7 ॥
शिव योगी तुम्हरे गुण गावेम् । ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावेम् ॥ 8 ॥
रूप सरस्वती का तुम धारा । दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा ॥ 9 ॥
धरा रूप नरसिंह को अंबा । परगट भयि फाड के खंबा ॥ 10 ॥
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रक्षा कर प्रह्लाद बचायो । हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो ॥ 11 ॥
लक्ष्मी रूप धरो जग माहीम् । श्री नारायण अंग समाहीम् ॥ 12 ॥
क्षीरसिंधु में करत विलासा । दयासिंधु दीजै मन आसा ॥ 13 ॥
हिंगलाज में तुम्हीं भवानी । महिमा अमित न जात बखानी ॥ 14 ॥
मातंगी धूमावति माता । भुवनेश्वरी बगला सुखदाता ॥ 15 ॥
श्री भैरव तारा जग तारिणी । छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी ॥ 16 ॥
केहरि वाहन सोह भवानी । लांगुर वीर चलत अगवानी ॥ 17 ॥
कर में खप्पर खडग विराजे । जाको देख काल डर भाजे ॥ 18 ॥
तोहे कर में अस्त्र त्रिशूला । जाते उठत शत्रु हिय शूला ॥ 19 ॥
नगरकोटि में तुम्हीं विराजत । तिहुँ लोक में डंका बाजत ॥ 20 ॥
शुंभ निशुंभ दानव तुम मारे । रक्तबीज शंखन संहारे ॥ 21 ॥
महिषासुर नृप अति अभिमानी । जेहि अघ भार मही अकुलानी ॥ 22 ॥
रूप कराल कालिका धारा । सेन सहित तुम तिहि संहारा ॥ 23 ॥
पडी भीढ संतन पर जब जब । भयि सहाय मातु तुम तब तब ॥ 24 ॥
अमरपुरी अरु बासव लोका । तब महिमा सब कहें अशोका ॥ 25 ॥
ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी । तुम्हें सदा पूजें नर नारी ॥ 26 ॥
प्रेम भक्ति से जो यश गावेम् । दुःख दारिद्र निकट नहिं आवेम् ॥ 27 ॥
ध्यावे तुम्हें जो नर मन लायि । जन्म मरण ते सौं छुट जायि ॥ 28 ॥
जोगी सुर मुनि कहत पुकारी । योग न होयि बिन शक्ति तुम्हारी ॥ 29 ॥
शंकर आचारज तप कीनो । काम अरु क्रोध जीत सब लीनो ॥ 30 ॥
निशिदिन ध्यान धरो शंकर को । काहु काल नहिं सुमिरो तुमको ॥ 31 ॥
शक्ति रूप को मरम न पायो । शक्ति गयी तब मन पछतायो ॥ 32 ॥
शरणागत हुयि कीर्ति बखानी । जय जय जय जगदंब भवानी ॥ 33 ॥
भयि प्रसन्न आदि जगदंबा । दयि शक्ति नहिं कीन विलंबा ॥ 34 ॥
मोको मातु कष्ट अति घेरो । तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो ॥ 35 ॥
आशा तृष्णा निपट सतावेम् । रिपु मूरख मॊहि अति दर पावैम् ॥ 36 ॥
शत्रु नाश कीजै महारानी । सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी ॥ 37 ॥
करो कृपा हे मातु दयाला । ऋद्धि-सिद्धि दे करहु निहाला । 38 ॥
जब लगि जियू दया फल पावू । तुम्हरो यश मैं सदा सुनावू ॥ 39 ॥
दुर्गा चालीसा जो गावै । सब सुख भोग परमपद पावै ॥ 40 ॥
देवीदास शरण निज जानी । करहु कृपा जगदंब भवानी ॥
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